30/11/2025
लेकिन भागम-भाग भरी ज़िंदगी से थोड़ा वक़्त निकाल कर जब आप प्रकृति की उस खूबसूरत दुनिया में पहुंचेंगे तो पायेंगे कि कुदरत की महीन कारीगरी से काढ़े गए इमली के सुंदर पत्ते आज भी उतने ही खट्टे हैं। खर-पतवार वाले वो फूल आज भी उतने ही सुंदर हैं। लड़कपन के दिनों की तरह आज भी उन पर तितलियाँ मंडराया करती हैं, वो तो बस हम हैं जिन्हें फूल और खर-पतवार का फ़र्क समझ आ गया है। इस वजह से वो खर जिनके पत्ते/फूल/ फल घरवालों के मना करने के बाद भी सिर्फ़ देख और परख ही नहीं बल्कि चख भी कर रखें हैं, उन्हें छूने में संकोच हो रहा था। "कोई क्या सोचेगा" से ज्यादा संकोच इस बात का था कि बचपन वाली पवित्रता खोने के बाद इन्हें छूने से इन्हें भी अपने जैसा तो नहीं बना लेंगे? देखा! ऐसा दूषित विचार किसी बड़े के दिमाग़ में ही आ सकता है वरना कोमल मन के उन फूलों को पवित्रता-अपवित्रता से क्या मतलब? पवित्रता से याद आया वो विशाल वट वृक्ष जो टाइम ट्रैवल की अपनी चमत्कारी शक्ति से एक ही वक़्त में आपको अपनी छाँव में बड़ों की चौपाल और जटाओं में बच्चों की झूले वाली दुनिया की सैर एक साथ करा सकता है। बच्चे आज भी उतने ही क्रिएटिव और कल्पनाशील है, जितने हाथों में स्मार्ट फ़ोन आने से पहले थे। वो तो हम हैं जो मनोचिकित्सकों के चक्कर काट रहे हैं और वहाँ से दिल औ दिमाग़ से बच्चा बनने की नसीहतें लेकर आ रहे हैं। बच्चे तो अब भी ख्यालों की पतंग उड़ा रहे हैं। फ़िकर को फुटबॉल बना किक मार रहे हैं और मुहल्ले के नवजात कुत्तों के लिए घर बना रहे हैं।
30/11/2025
- नेहा मिश्रा "प्रियम
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