शुभ निजे- 2
इन दिनों मुझे लगने लगा है कि बुद्ध के गृह परित्याग का कारण चाहे उनकी नियति रही हो। लेकिन स्वर्ग सरीखे महल में किसी सुंदर स्वप्न सा जीवन जीने वाले सिद्धार्थ को दुनिया दुःख से भरी हुई पहली बार तब लगी होगी जब उन्होंने पहली बार राहुल को दुःख में देखा होगा। और दुनिया से पूरी तरह नाउम्मीद तब जब खुद को राहुल का दुःख दूर करने में स्वयं को पूरी तरह अक्षम पाया होगा। अब देखो ना, आज ही की बात है, तुम्हारी आँखों में तुम्हारी ही एक पलक टूट कर गिर गई है। बाहर गिरी होती तो तुम्हारे हक़ में दुआएँ मांगती लेकिन मैं सब जतन करने के बाद ईश्वर से केवल यही प्रार्थना कर सकी कि वो तुम्हारी आँख में गिरी उस नन्हीं सी पलक को तुम्हारी आँखों से बाहर निकालने में मेरी और तुम्हारी मदद करें। इसी तरह जब राजकुमार सिद्धार्थ ने देखा होगा कि वह अपने नन्हें राजकुमार को चींटी और मच्छरों जैसे कीट और कीड़ो तक से नहीं बचा पा रहे हैं तो अवश्य ही उनका दिल छलनी हुआ होगा। व इन पीड़ाओं का उपचार ढूढ़ने चल दिये होंगे दिन- रात की परवाह किये बगैर। यही तो किया था महाराज शुद्धोधन ने... फूल से नन्हें राजकुमार के वनों में व्याकुल...