Posts

शुभ निजे- 2

Image
इन दिनों मुझे लगने लगा है कि बुद्ध के गृह परित्याग का कारण चाहे उनकी नियति रही हो। लेकिन स्वर्ग सरीखे महल में किसी सुंदर स्वप्न सा जीवन जीने वाले सिद्धार्थ को दुनिया दुःख से भरी हुई पहली बार तब लगी होगी जब उन्होंने पहली बार राहुल को दुःख में देखा होगा। और दुनिया से पूरी तरह नाउम्मीद तब जब खुद को राहुल का दुःख दूर करने में स्वयं को पूरी तरह अक्षम पाया होगा। अब देखो ना, आज ही की बात है, तुम्हारी आँखों में तुम्हारी ही एक पलक टूट कर गिर गई है। बाहर गिरी होती तो तुम्हारे हक़ में दुआएँ मांगती लेकिन मैं सब जतन करने के बाद ईश्वर से केवल यही प्रार्थना कर सकी कि वो तुम्हारी आँख में गिरी उस नन्हीं सी पलक को तुम्हारी आँखों से बाहर निकालने में मेरी और तुम्हारी मदद करें। इसी तरह जब राजकुमार सिद्धार्थ ने देखा होगा कि वह अपने नन्हें राजकुमार को चींटी और मच्छरों जैसे कीट और कीड़ो तक से नहीं बचा पा रहे हैं तो अवश्य ही उनका दिल छलनी हुआ होगा। व इन पीड़ाओं का उपचार ढूढ़ने चल दिये होंगे दिन- रात की परवाह किये बगैर। यही तो किया था महाराज शुद्धोधन ने... फूल से नन्हें राजकुमार के वनों में व्याकुल...

26/02/2026

परसों होली की शॉपिंग के लिए बाहर गई थी। यूँ तो ज़रूरत भर की चीज़ें ले ली थी मैंने लेकिन फ़िर भी मन नहीं माना तो बिल पे करने से पहले सोचा मॉल के एक और चक्कर काट लूँ, ताकी कोई खूबसूरत चीज़ मेरी नज़रों से बच न जाए। सेकेंड फ्लोर पर कुर्तियों के सेक्शन में घूम रही थी कि देखा मैं जहाँ जा रही हूँ, मुझसे पहले एक सेल्स बॉय वहाँ पहुँच कर पहले से ही ठीक-ठाक लगी कुर्तियों को ठीक करने लगता। उसकी इस हरकत पर भीतर से बुरी तरह झुंझलाने के बाद भी उसके "नेचर ऑफ जॉब" को समझते हुए मैं शांत रही और उसे व्यस्त करने के इरादे से एक ख़ास किस्म के कुर्ते की डिमांड कर दी। उसने इशारे से समझाया कि मैं जैसा चाह रही, वैसा कुर्ता मौज़ूद नहीं है। हाँ, उससे थोड़ा मिलता जुलता कुर्ता है। मैंने फ़िर उसे अपने उस ख़ास किस्म का कुर्ता ढूँढने का उद्देश्य बताते हुए कहा कि क्यों मुझे मिलता जुलता नहीं, बल्कि बिल्कुल वही चाहिए। उसने फ़िर इशारे से समझाया कि मैं जो ढूंढ रही, वह नहीं है। इस बीच कितनी ही बार भूल वश मैंने खुद बोलना छोड़ अपनी बात उसे इशारे में समझाने की कोशिश करती और अगले ही पल स्वयं को समझाती कि अगला बोल नहीं ...

बसंत

Image
प्यारे बसंत किधर रह गए हो तुम? अब तक तो तुम्हें आ जाना चाहिए था? तुम कहीं मेरे घर का पता तो नहीं भूल गए? खैर, अगर भूल भी गए हो तो इसमें हैरत की क्या बात? इन दिनों तो मैं ख़ुद ही ख़ुद को भूली बैठी हूँ। ऐसे में तुम्हारा मुझे याद रखना पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरी हो गया है। ज़िंदगी की जानें कैसी ज़िंदान में कैद हो कर रह गई हूँ, जहाँ मौसमों के निशान नहींं पहुँच पा रहे? दूध के जल्दी ख़राब हो जाने से गरमी का पता चलता है और घी के जमने से सर्दी का अंदाज़ा लगा लेती हूँ। न सर्दी हाड़ कंपाती है, ना गरमी देह झुलसाती है। ना तुम ही आकर दो घड़ी दिल बहलाते हो। ऐसे में बस मेरी सहेली बारिश ही रह गई है जो मेरी खिड़की पर आकर मेरा हाल पूछ जाती है। हाँ, जानती हूँ... इसमें मेरी भी गलतियाँ हैं, लेकिन तुम ही कुछ सही कर दो ना? तुम्हें याद भी है कि तुम्हारे साथ खिले-खिलखिलाए हुए कितने मौसम गुज़र गए? या तो तुम मेरे पास आ जाओ या फिर मुझे बुला लो वहाँ, जहाँ तुम हो। जहाँ फ़िर से तुम्हारी कस्तूरी खुशबू मुझ मृगी को बेसुध कर दे। जहाँ फ़िर से मेरी आँखों में उम्मीदों की कलियाँ चटकने लगें। जहाँ फ़िर से मेरा ज़हन ...

30/12/2025

Image
कहीं किसी जनजाति के बारे में पढ़ा था कि जब उन्हें पेड़ों को काटना होता है तो वो पेड़ों को डायरेक्ट काट नहीं देते बल्कि कुछ दिनों तक रोज आकर उस पेड़ को अपशब्द कहते हैं। कटु शब्दों की इस ताकत से जल्दी ही एक हरा- भरा पेड़ सूख जाता है तब लोग आकर उस पेड़ को काट लेते हैं। अगर पेड़ पर कटुक्तियों का ऐसा प्रभाव है तो किसी मनुष्य पर इन कठोर वचनों का कितना गहरा प्रभाव होता होगा?  अभी हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक वीडियो देखी जिसमें नये जोड़े में एक दुल्हन को विदाई के बाद ससुराल में अपने पति को नारायणस्वरूप मान कर उसका चरण पखारने के बाद सबके सामने उस पानी को तीन बार चख रही है और लोग देख रहे हैं। उसका पति भी और जैसी कि आशा थी घर- परिवार की औरतें ही इस वाहियात रस्म को निभवाने में उत्साह से लगी हुईं थीं और यदि वधू ने रस्म करने में कोई चू- चपड़ की होती तो ये स्त्रियाँ ही सबसे ज्यादा दुःखी व नाराज़ होतीं। थोड़ा सर्च करने पर पता चला कि यह रस्म दुग्गा के उस बंगाल की है जिसे हम शक्ति उपासक, जागरूक, स्त्री अधिकारों के प्रति अति सचेत तथा फेमिनिस्ट समझते हैं। जब वहाँ ये हो रहा है तो बाकी ज़हालत...

30/11/2025

Image
दूसरी-तीसरी मंजिल की खिड़की से बाहर झाँकने पर भी दूसरे घरों की ज्यादातर बंद और कभी-कभार अधखुली खिड़कियाँ ही नज़र आती हैं। बाहर से बंद इन खिड़कियों की देखा-देखी भीतर की ख्याली खिड़कियाँ कब बंद होने लगती हैं, पता ही नहीं चलता। ज़ेहन पर जंग लगने लगती है। विचार कुंद होते रहते हैं। इस घुटन को थोड़ा और विस्तार तब मिलता है। जब खुला आसमान और ज़मीन देखे ज़माने हो जाते हैं। हम सोचते हैं कि पिछले साल नुक्कड़ पर दिखे कनेर के पेड़ पर इस मौसम फूल आये होंगे? ग्लोबल वॉर्मिंग के इस ज़माने में क्या तितलियाँ सलामत होंगी? क्या फोन से चिपके बच्चे अब भी साथ मिलकर खेलते होंगे? क्या सब कुछ उतना ही सुंदर होगा, जैसा पहले देखने पर हुआ करता था.. या अब बस? वो वक़्त, वो ज़माना नहीं रहा?  लेकिन भागम-भाग भरी ज़िंदगी से थोड़ा वक़्त निकाल कर जब आप प्रकृति की उस खूबसूरत दुनिया में पहुंचेंगे तो पायेंगे कि कुदरत की महीन कारीगरी से काढ़े गए इमली के सुंदर पत्ते आज भी उतने ही खट्टे हैं। खर-पतवार वाले वो फूल आज भी उतने ही सुंदर हैं। लड़कपन के दिनों की तरह आज भी उन पर तितलियाँ मंडराया करती हैं, वो तो बस हम हैं ...