बसंत
प्यारे बसंत किधर रह गए हो तुम? अब तक तो तुम्हें आ जाना चाहिए था? तुम कहीं मेरे घर का पता तो नहीं भूल गए? खैर, अगर भूल भी गए हो तो इसमें हैरत की क्या बात? इन दिनों तो मैं ख़ुद ही ख़ुद को भूली बैठी हूँ। ऐसे में तुम्हारा मुझे याद रखना पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरी हो गया है। ज़िंदगी की जानें कैसी ज़िंदान में कैद हो कर रह गई हूँ, जहाँ मौसमों के निशान नहींं पहुँच पा रहे? दूध के जल्दी ख़राब हो जाने से गरमी का पता चलता है और घी के जमने से सर्दी का अंदाज़ा लगा लेती हूँ। न सर्दी हाड़ कंपाती है, ना गरमी देह झुलसाती है। ना तुम ही आकर दो घड़ी दिल बहलाते हो। ऐसे में बस मेरी सहेली बारिश ही रह गई है जो मेरी खिड़की पर आकर मेरा हाल पूछ जाती है। हाँ, जानती हूँ... इसमें मेरी भी गलतियाँ हैं, लेकिन तुम ही कुछ सही कर दो ना? तुम्हें याद भी है कि तुम्हारे साथ खिले-खिलखिलाए हुए कितने मौसम गुज़र गए? या तो तुम मेरे पास आ जाओ या फिर मुझे बुला लो वहाँ, जहाँ तुम हो। जहाँ फ़िर से तुम्हारी कस्तूरी खुशबू मुझ मृगी को बेसुध कर दे। जहाँ फ़िर से मेरी आँखों में उम्मीदों की कलियाँ चटकने लगें। जहाँ फ़िर से मेरा ज़हन ...