30/12/2025
कहीं किसी जनजाति के बारे में पढ़ा था कि जब उन्हें पेड़ों को काटना होता है तो वो पेड़ों को डायरेक्ट काट नहीं देते बल्कि कुछ दिनों तक रोज आकर उस पेड़ को अपशब्द कहते हैं। कटु शब्दों की इस ताकत से जल्दी ही एक हरा- भरा पेड़ सूख जाता है तब लोग आकर उस पेड़ को काट लेते हैं। अगर पेड़ पर कटुक्तियों का ऐसा प्रभाव है तो किसी मनुष्य पर इन कठोर वचनों का कितना गहरा प्रभाव होता होगा? अभी हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक वीडियो देखी जिसमें नये जोड़े में एक दुल्हन को विदाई के बाद ससुराल में अपने पति को नारायणस्वरूप मान कर उसका चरण पखारने के बाद सबके सामने उस पानी को तीन बार चख रही है और लोग देख रहे हैं। उसका पति भी और जैसी कि आशा थी घर- परिवार की औरतें ही इस वाहियात रस्म को निभवाने में उत्साह से लगी हुईं थीं और यदि वधू ने रस्म करने में कोई चू- चपड़ की होती तो ये स्त्रियाँ ही सबसे ज्यादा दुःखी व नाराज़ होतीं। थोड़ा सर्च करने पर पता चला कि यह रस्म दुग्गा के उस बंगाल की है जिसे हम शक्ति उपासक, जागरूक, स्त्री अधिकारों के प्रति अति सचेत तथा फेमिनिस्ट समझते हैं। जब वहाँ ये हो रहा है तो बाकी ज़हालत...