प्रेम है?
उसने पूछा प्रेम है?
मैंने लजाते हुए कहा...हां, प्रेम है।
वह चला गया।
कुछ समय बाद उसने दुबारा पूछा... प्रेम है?
मैंने इस बार मुस्कुरा कर कहा... हां, प्रेम है।
वह फ़िर चला गया।
इस बार वह थोड़े ज्यादा समय बाद लौटा
और आते ही सवाल दाग़ दिया... प्रेम है?
मैंने इस बार पूर्णत: समर्पण भाव से कहा...
हां, हां प्रेम है और बहुत प्रेम है
मगर वह अबके भी न रुका।
बरसों बाद वह एक और बार लौटा
रेशमी जुल्फों में चांदी, ओजस्वी मुख पर थकन
चमकती आंखों में विवशता लिए
मुझसे विनयी स्वर में पूछा अब भी प्रेम है क्या?
बारंबार उसके चले जानें से निराश
इस बार मैंने चिढ़ कर कहा.. नहीं है प्रेम
वह इस बार भी लौटने चला।
मेरा उत्तर चाहे जो होता लेकिन
उसका जाना हर बार की तरह ही निश्चित था
अन्तर केवल इतना था कि सदैव अहंकार में डूबा प्रेम
इस बार मेरी चौखट से निराश लौट रहा था।
और मैं निश्चय नहीं कर पा रही थी कि
मुझे प्रेम ठुकराये जानें की पीड़ा अधिक थी
अथवा प्रेमी को खाली हाथ विदा करने की।
~ नेहा मिश्रा 'प्रियम'
21/04/2023
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