शुभ निजे- 2
इन दिनों मुझे लगने लगा है कि बुद्ध के गृह परित्याग का कारण चाहे उनकी नियति रही हो। लेकिन स्वर्ग सरीखे महल में किसी सुंदर स्वप्न सा जीवन जीने वाले सिद्धार्थ को दुनिया दुःख से भरी हुई पहली बार तब लगी होगी जब उन्होंने पहली बार राहुल को दुःख में देखा होगा। और दुनिया से पूरी तरह नाउम्मीद तब जब खुद को राहुल का दुःख दूर करने में स्वयं को पूरी तरह अक्षम पाया होगा। अब देखो ना, आज ही की बात है, तुम्हारी आँखों में तुम्हारी ही एक पलक टूट कर गिर गई है। बाहर गिरी होती तो तुम्हारे हक़ में दुआएँ मांगती लेकिन मैं सब जतन करने के बाद ईश्वर से केवल यही प्रार्थना कर सकी कि वो तुम्हारी आँख में गिरी उस नन्हीं सी पलक को तुम्हारी आँखों से बाहर निकालने में मेरी और तुम्हारी मदद करें। इसी तरह जब राजकुमार सिद्धार्थ ने देखा होगा कि वह अपने नन्हें राजकुमार को चींटी और मच्छरों जैसे कीट और कीड़ो तक से नहीं बचा पा रहे हैं तो अवश्य ही उनका दिल छलनी हुआ होगा। व इन पीड़ाओं का उपचार ढूढ़ने चल दिये होंगे दिन- रात की परवाह किये बगैर।
यही तो किया था महाराज शुद्धोधन ने... फूल से नन्हें राजकुमार के वनों में व्याकुल भटकते यौवन की कल्पना भी सहन न कर सके तो अपने नन्हें पुत्र के जीवन को दुःख की परछाईं तक से दूर कर देने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना दिया था। लेकिन क्या शुद्धोधन ऐसा कर सके थे? वो तो राजा थे, कर सकते थे। राजकुमार के कमरे को दुनियाभर की बेहतरीन चीज़ों से सजा सकते थे। कदमों में फूल बिछा सकते थे। रेशमी वस्त्र, मखमली बिस्तर, हीरे-जवाहरात, स्वादिष्ट पकवान, सुरा, संगीत, सुंदरी युवा होते राजकुमार के जीवन को प्रसन्नता से भर देने वाली सभी प्रकार के प्रयास। लेकिन क्या कभी नन्हें राजकुमार के खुद के हाथों से खुद को दी हुई चोट के आगे राजा असहाय हुए होंगे? क्या कभी आसमान में उड़ती चिड़िया को देख कर खिलखिला उठने वाले राजकुमार को चिड़िया के आँखो से ओझल होने पर उदास होने की पीड़ा के सम्मुख स्वयं को हारा हुआ समझा होगा उन्होंने? या ये पीड़ाएं केवल आम लोगों के लिए ही हैं?
मैं तुम्हारे लिए भी महाराज शुद्धोधन जैसे ही इंतज़ाम करना चाहती हूँ। तुम्हें जीवन के हर दुःख से दूर रखना चाहती हूँ लेकिन मेरे बच्चे तुम्हारे लिए सुख से भरी एक सुंदर दुनिया मैं कहाँ से लाऊँ। मैं तो तुम्हें तुम्हारी खोई हुई तितली भी नहीं दिला पा रही। आसमान में उड़ती चिड़िया तुम्हारे देखते ही देखते आँखों से ओझल हो जाती है और तुम्हारी मुझसे ये उम्मीद कि मैं तुम्हारे लिए चिड़िया को आसमान में वापस ले आऊँ? या उड़ कर तुमसे दूर जा रही तितली के पीछे भागूं। लेकिन शोना, सिद्धार्थ की तरह जब तुम्हें भी बोध होगा तब तुम समझ जाओगे कि जीवन दुःखमय है और इसीलिए जीवन है वरना कोई सजावटी पुतला या रोबोट भर नहीं होता? केवल सुख से जीवन में नीरसता आती है और तितिलियाँ ज्यादा देर आँखों के सामने रहने पर सुंदर लगना बंद कर देती हैं और चिड़िया के गीत शोर। इसलिए प्रकृति के कुछ नियमों में दखल ना देकर उनका आनंद लेना ही सही है, जैसे मैं इस समय तुम्हारी इस उम्र का आनंद ले रही हूँ।
PS: ये सब मैंने पिछले हफ़्ते महसूस किया था, जब तुम्हें मौसमी ज़ुकाम से परेशान देखा था। और हाँ, दुनिया की किसी भी भाषा में मैं तुम्हारे लिए अपना प्यार बयां नहीं कर सकती, ये सब तो बस दिल की तसल्ली के लिए है।
नेहा मिश्रा "प्रियम"
28/10/2026
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